Fair And Lovely removed "Fair"

Fair and Lovely से ‘फेयर’ को क्यो हटाया । Why does it matter

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नमस्कार दोस्तो: आपको बतादे कि देश में योग गुरु बाबा रामदेव ने कोरोना वेक्सिन बनाने के बाद अब Fair and Lovely क्रिम भी काफी चर्चा में आ गई है। सुचना के लिए बतादे कि कुछ डेढ़ दशक पहले एक अंग्रेज़ी अख़बार में छपे एक पन्ने के फ़ेयरनेस क्रीम के विज्ञापन की ये टैगलाइन थी। एक अनफ़ेयर दुनिया में कम से कम आपकी त्वचा तो फ़ेयर हो ही सकती है।

Fair And Lovely removed "Fair"

उसमें लिखा था दुनिया अनफ़ेयर हो और चमड़ी का रंग फ़ेयर न हो तो क्या होता है, ये हमने हाल में अमरीका के मिनिसोटा में होते देखा, जिसने दुनिया के सबसे ताक़तवर और विशाल देश के रंगभेद और नस्लभेद की पोल खोल दी।

Fair lovely ने “Fair” शब्द हटाया

उस घटना के महज एक महीने बाद 25 जून को ब्रिटिश-डच मल्टीनेशनल कंपनी यूनीलीवर ने अपने स्किन केयर प्रोडक्ट्स में से फ़ेयर, फ़ेयरनेस, व्हाइट, व्हाइटनिंग, लाइट, लाइटनिंग जैसे शब्दों को हटाने का फ़ैसला किया है। कंपनी के इस फ़ैसने के बाद अब फ़ेयर एंड लवली क्रीम के नाम में से भी फ़ेयर (जिसका अर्थ है ”अच्छा दिखना”) शब्द हट जाएगा।

क्या यह इत्तेफ़ाक़ है? कि क्रीम की टैगलाइन बदल रही है। अब बात त्वचा नहीं, दुनिया को थोड़ा और फ़ेयर बनाने की है।

तो चलिए अब थोड़ा अतीत पर भी नज़र डालते हैं। सांवले लोगों के देश में गोरेपन की इस पागलपन की सीमा का शौक का इतिहास कितना पुराना है। जितने साल इस देश को आज़ादी पाए हुए, उससे बस कुछ 27 साल कम हुए हमें अपनी चमड़ी को गोरा बनाने की क्रीम लगाते हुए।

भारत मे कैसे आयी Fair and Lovely

आज से करीब 45 वर्ष पहले 1975 में हिंदुस्तान यूनीलीवर ने पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप की सांवली लड़कियों की त्वचा को गोरा बनाने का अचूक नुस्ख़ा बताकर फ़ेयर एंड लवली नाम की क्रीम बाज़ार में उतारी थी। उस समय से लेकर अब तक औरतों की न जाने कितनी पीढ़ियां क्रीम लगाते- लगाते जवान हुईं और उम्र की ढलान की ओर बढ़ चलीं, लेकिन उनका सांवला रंग सांवला हि रह। और न गोरे होने की उम्मीद।

हालांकि Fair and Lovely कंपनी ने अब तक भी उम्मीद बेचना बंद नहीं किया था। औरतों से लाचारी आई तो मर्दों को भी गोरा बनाने की क्रीम बेचने लगी- fair and handsome| मानो फ़ेयर न हुआ तो हैंडसम ही क्या|

मर्दों का तो सिर्फ मुंह ही गोरा किया था, लेकिन औरतों को बोला कि ये कांख(दोनो हाथो के निचे) के कालेपन के लिए भी क्रीम लगाओ, घुटने, कोहनी के कालेपन के लिए अलग क्रीम लगाओ, यहां तक कि प्राइवेट पार्ट तक को गोरा बनाने की क्रीम बाज़ार अपनी जडे जमा बैठी।

सब कुछ बदल गया, पर गोरेपन कि उम्मीद नही

हालांकी देखा जाए तो 45 साल से गोरेपन कि उम्मीद बेच रही फ़ेयर एन्ड लवली कंपनी नहीं बदली थी, परंतु इस बीच बहुत कुछ चीज़ें ज़रूर बदल गईं।

जैसे लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबरी का अधिकार भी मिल गया, विशाखा गाइडलाइंस आ गईं, औरतों के हक़-हुक़ूक़, बराबरी की बात करने वाले नए क़ानून आ गए औरत मर्दो से कंधे से कंधा मिलाकर चलने लगी लेकिन औरतो को गोरा करने वाली क्रिम नही। कॉलेज और दफ़्तरों का जेंडर अनुपात सुधरने लगा, बड़ी संख्या में लड़कियां नौकरी कर पैसा कमाने और अपना घर और खुद कि पहचान बनाने लगीं।

Equal pay, women Right जैसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी में साग- रोटी की तरह इस्तेमाल होने वाले शब्द हो गए। और तो और, औरतों के हिस्से में इतनी आत्मनिर्भरता, इतना पैसा और इतना स्वाभिमान आया कि कुछ हिरोइनों ने फ़ेयरनेस क्रीम का विज्ञापन और उसके लिए मिल रहे दो करोड़ रुपए को भी ठोकर मार दी।

कंपनी को तो अब 45 साल बाद थोडा कुछ समझ आया, इस देश की लड़कियों को पिछले एक दशक से ये बात कुछ-कुछ समझ आनी शुरू हो गई थी कि क्रीम लगाकर गोरा बनने से लड़की एयर होस्टेस नही बन जाती है, न रेस में First आ सकती है। और न Bollywood की सुपर स्टार बन सकती है, इन सब के लिए मेहनत करनी होती है।

शादी के बाज़ार में गोरी लड़कीया बाजी मार जाती है

देखा जाए तो आज भी शादी के पैंठ में गोरी लड़की की डिमाँन्ड टॉप पर है। अख़बारों में आया शादी का हर विज्ञापन कुछ भी चाहने से पहले गोरी, सुंदर और सुशील लड़की ही चाह रहा है, लेकिन दुख की बात यह है कि ऐसा चाहने वाले मर्दों को अब लड़कियां चाहने से मना कर रही हैं।

और कही ना कही Fair & Lovely का निर्णय सही भी है जब लड़कियां इतनी बदल रही हैं तो कंपनियां इतना तो बदल ही सकती हैं कि अपनी क्रीम से फ़ेयर (Fair And Lovely removed “Fair) जैसा अनफ़ेयर (Unfair) शब्द हटा दें। यह समझना सही होगा या गलत कि बाज़ार लड़कियों को बदल रहा है या लड़कियां बाज़ार को बदल रही है।

करीब एक दशक पहले जो विज्ञापन (एड) औरतों को पति की शर्ट में ज़्यादा सफ़ेदी लाने के नुस्ख़े बताते थे, अब पूछ रहे हैं, कपड़े धोना सिर्फ़ औरतों का काम क्यों है। टैगलाइन है- “शेयर द लोड।”

सांवले रंग पर सवाल क्यों ?

Fair And Lovely removed "Fair"

अब सवाल यह आता है कि, कैसे श्याम वर्ण की (साँवले रंग की) नायिकाओं के देश में श्याम देह वाली लड़कियां शर्म और डर में डूब गईं?

ताराशंकर बंदोपाध्याय की कहानी की सांवली बहू की तरह तमाम सांवली महिलाए के हिस्से में अपमान और अनादर के कहर से झुजना पडा। उस पिता के देहली से बारात इसलिए लौट गई कि दुल्हन सांवली थी।

मेडिकल कॉलेज कि टॉपर्स लड़की ने फांसी लगाकर अपना देह इसलिए भी त्याग दिया क्योंकि वो अपने सांवले रंग पर शर्मिंदा थी। अपने पड़ोस का हि हाल देख लिजिए कि शर्मा जी बड़ी बहन को देखने आए थे पर उसकी 15 साल कि मासुम छोटी बहन पसंद आई, क्योंकि वह बडी बहन से ज्यादा गोरी थी। उस घटना को 10 बरस से ज्यादा हो गए, सांवली बहन की अभी तक शादी नहीं हुई है।

कृष्ण रंग सांवले लोगों के देश में 45 साल से गोरा बनाने की क्रीम बेचने वाली कंपनियां अब तक यही शर्मिंदगी और अपमान और उम्मीद बेच कर अपना पेट पाल रही। क्रीम लगाकर एक दिन गोरा जरुर हो जाओगे और फिर ज़्यादा प्यार, ज़्यादा इज़्ज़त, मान ,सम्मान और ज़्यादा सफलता पाने का भ्रम दिमाग मे कचरे कि तरह ठुस रही थी।

अच्छी बात तो यह है कि, यह भ्रम टूटा है। फ़ेयर शब्द हटाने जैसे एक छोटे से और तुच्छ क़दम ने यह तो जाहिर कर ही दिया कि ये बात कितनी अनफ़ेयर और अर्थहिन थी।

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