युवावस्था में भूकम्प की – सी भयंकरता होती है : भगत सिंह, Value of youth

Value of Youth: दोस्तो आज आपको अतीत के एक हिस्से में ले जाते है जिसने भारत का नक्शा हि बदल कर रख दिया। एक-सौ साल पुरानी बात है। 1919 का अग्रेंजी हुकुमत का साल था। अंग्रेजी हुकूमत ने जलियांवाला बाग में निर्दोष लोगों का कत्लेआम किया था। इस नरसंहार के बाद एक 12 साल का लड़का उस घटनास्थल पर गया।

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वह खुशमिजाज और चंचल बालक, लेकिन, उसने जलियांवाला बाग में जो देखा, वह उसकी सोच के परे था। वह स्तब्ध था, यह सोचकर कि कोई भी इतना निर्दयी- क्रुर कैसे हो सकता है। वह मासूम गुस्से की आग में जलने लगा था। उसी जलियांवाला बाग में उसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ने की कसम खाई। जिसका नाम क्रंतिकारी स्वतंत्र सेनानी भगत सिंह था।  

सूर्य कभी अस्त नहीं होता था

एक हुकूमत जिसका दुनिया के इतने बड़े हिस्से पर शासन था, इसके बारे में कहा जाता था कि उनके शासन में सूर्य कभी अस्त नहीं होता। इतनी ताकतवर हुकूमत, एक 23 साल के युवक से भयभीत हो गई थी। वे जब तक जिए, सिर्फ एक मिशन के लिए जिए और उसी के लिए उन्होंने अपना बलिदान दे दिया- वह मिशन था भारत को अन्याय और अंग्रेजी शासन से मुक्ति दिलाना।

 भगत सिंह का जीवन सफर

आपको बतादे कि भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था जो एक पाकिस्तान का हिस्सा है। हर भारतीय की तरह भगत सिंह का परिवार भी आजादी का पैरोकार था। उनके चाचा अजीत सिंह और श्वान सिंह भी आजादी के मतवाले थे और करतार सिंह सराभा के नेतृत्व में गदर पाटी के खास सदस्य थे।

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 अपने घर में क्रांतिकारियों की मौजूदगी से भगत सिंह पर गहरा प्रभाव पड़ा और अपनी मिशाल पेश कि। इन दोनों का असर था कि वे बचपन से ही अंग्रेजों से नफरत कि आग सिने जलने लगी। 14 वर्ष की उम्र में भगत सिंह ने सरकारी स्कूलों की पुस्तकें और कपड़े जला दिए। जिसके बाद भगत सिंह के पोस्टर गांवों में छपने लगे। 

युवावस्था में भूकम्प की – सी भयंकरता

युवावस्था मानव – जीवन का वसंतकाल है । उसे पाकर मनुष्य मतवाला हो जाता है । विधाता की दी हुई सारी शक्तियां सहस्र धारा होकर फूट पड़ती हैं। 16 से 25 वर्ष तक हाड़ – चाम के सन्दूक में संसार – भर के हाहाकारों को समेटकर विधाता बन्द कर देता है। युवावस्था देखने में तो शस्यश्यामला वसुन्धरा से भी सुंदर है , पर इसके अन्दर भूकम्प की – सी भयंकरता भरी हुई है ।

इसीलिए युवावस्था में मनुष्य के लिए केवल दो ही मार्ग हैं- वह चढ़ सकता है उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर, और वह गिर सकता है अधःपात के अंधेरे खन्दक में। चाहे तो त्यागी हो सकता है युवक, चाहे तो विलासी बन सकता है युवक। देवता बन सकता है युवक।

Value of youth

संसार में युवक का ही साम्राज्य है। युवक के कीर्तिमान से संसार का इतिहास भरा पड़ा है। युवक ही रणचंडी के ललाट की रेखा है। वह महाभारत के भीष्मपर्व की पहली ललकार के समान विकराल है। अगर किसी विशाल हृदय की आवश्यकता हो , तो युवकों के हृदय टटोलो।

अगर किसी आत्मत्यागी वीर की चाह हो , तो युवकों से मांगो। रसिकता उसी के बांटे पड़ी है। भावुकता पर उसी का सिक्का है। वह छन्द शास्त्र से अनभिज्ञ होने पर भी प्रतिभाशाली कवि है। कवि भी उसी के हृदयारविन्द का मधुप है। वह रसों की परिभाषा नहीं जानता , पर वह कविता का सच्चा मर्मज्ञ है। पतितों के उत्थान और संसार के उद्धारक सूत्र उसी के हाथ में हैं|

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ईश्वरीय रचना – कौशल का एक उत्कृष्ट नमूना युवक। संध्या समय वह नदी के तट पर घंटों बैठा रहता है। क्षितिज की ओर बढ़ते जाने वाले रक्त – रश्मि सूर्यदेव को आकृष्ट नेत्रों से देखता रह जाता है। उस पार से आती हुई संगीत – लहरी के मन्द प्रवाह में तल्लीन हो जाता है।

विचित्र है उसका जीवन। अद्भुत है उसका साहस। अमोघ है उसका उत्साह। वह इच्छा करे तो समाज और जाति को उत्थान कर दे , देश की लाली रख ले , बड़े – बड़े साम्राज्य उलट डाले। वह इस विशाल विश्व रंगस्थल का सिद्धहस्त खिलाड़ी है। आज के युवक ही कल के देश के भाग्य – निर्माता हैं। वे ही भविष्य के सफलता के बीज हैं।

दोस्तो इस पुरे पोस्ट में हमने Value of Youth, भगत सिह का युवावस्था का कार्यकाल आदि के बारे जाना। इस पोस्ट को करने का एक मात्र उद्देश्य युवाओ की शक्ती का सही उपयोग  करना है। और समाज और देश को उन्नत बनाने में अपना अहम योगदान देना है।

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