ISRO Chandrayaan-2

Chandrayaan-2 चांद की सतह पर विक्रम के लैंडर का पता चला, ऑर्बिटर ने फोटो ली; संपर्क की उम्मीद बडी : ISRO

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ISRO-Chandrayaan-2, आपके बतादे कि उम्मीद कि एक छोटी सी किरन गहनतम अंधकार पर भारी पडती है, आपको जानकारी देदे कि ISRO ने चंद्रयान-2 विक्रम के लैंडर का पता लगाने में सफलता हासिल की है। इसरो के चेयरमैन डॉ. के सिवन ने रविवार को बताया कि चंद्रमा पर विक्रम लैंडर का पता लग चुका है।

Chandrayaan-2 Vikram's lander detected

ऑर्बिटर ने लैंडर की कुछ (Thermal image) ली हैं। विक्रम से संपर्क की कोशिशें लगातार जारी हैं। हालांकि, ऑर्बिटर के द्वारा ली गईं लैंडर की तस्वीरें इसरो तक पहुंचना बाकी हैं।

अभी भी इसरो लैंडर विक्रम से संपर्क साधने की कोशिशों में जुटा है। लेकिन  कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि दोबारा संपर्क स्थापित करने का वक्त गुजर चुका है और इसकी संभावनाएं बहुत कम हैं। पर “उम्मिद कि एक छोटी सी किरन गहनतम अंधकार पर भारी पडती है”। मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों ने कहा कि यह अच्छा संकेत है कि विक्रम सोलर पैनल की मदद से बैटरी चार्ज कर रहा है।

हार्ड लैंडिंग हुई है तो नुकसान

किसी वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि अगर चांद की सतह पर विक्रम की हार्ड लैंडिंग हुई है तो इससे उसे नुकसान पहुंचने की आशंका है। वह अपने चार लेग पर उतरा होगा, इसकी संभावना बहुत कम है।

ISRO, 7 सितंबर को अंतरिक्ष विज्ञान में इतिहास रचने के करीब था, लेकिन चंद्रयान-2 के लैंडर विक्रम का लैंडिंग से महज 69 सेकंड पहले पृथ्वी से संपर्क टूट गया। चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर लैंडर विक्रम की शुक्रवार-शनिवार की दरमियानी रात 1 बजकर 53 मिनट पर लैंडिंग होनी थी। लेकिन आखिरी चरण में लैंडर से संपर्क टूटा था।

ISRO Chandrayaan-2

जिस ऑर्बिटर से लैंडर अलग हुआ था, वह अभी भी चंद्रमा की सतह से 119 किमी से 127 किमी की ऊंचाई पर घूम रहा है। 2,379 किलो वजनी ऑर्बिटर के साथ 8 पेलोड हैं और यह 7 साल तक काम करेगा। यानी लैंडर और रोवर की स्थिति पता नहीं चलने पर भी मिशन जारी रहेगा। 

8 पेलोड के अलग-अलग काम होंगे…

  • चांद की सतह का नक्शा तैयार करना। इससे चांद के अस्तित्व और उसके विकास का पता लगाने की कोशिश होगी।
  • सूरज की किरणों में मौजूद सोलर रेडिएशन की तीव्रता को मापना।
  • मैग्नीशियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम, टाइटेनियम, आयरन और सोडियम की मौजूदगी का पता लगाना।
  • चांद की सतह की हाई रेजोल्यूशन तस्वीरें खींचना। 
  • चांद के दक्षिणी ध्रुव पर पानी की मौजूदगी और खनिजों का पता लगाना।
  • सतह पर चट्टान या गड्ढे को पहचानना ताकि लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग हो।
  • ध्रुवीय क्षेत्र के गड्ढों में बर्फ के रूप में जमा पानी का पता लगाना।
  • चंद्रमा के बाहरी वातावरण को स्कैन करना।

अब तक 109 मून मिशन में से 61% ही सफल: नासा 

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि पिछले छह दशक में चांद पर भेजे गए महज 61 फीसदी मिशन ही सफल हो पाए हैं। आपको बतादे कि 1958 से लेकर अब तक 109 मिशन चांद पर भेजे गए, लेकिन इसमें सिर्फ कुछ फिसदी लगभग 60 मिशन ही सफल हो पाए। आपको बतादे कि लूनर मिशन में पहली सफलता रूस को 4 जनवरी 1959 में मिली थी।

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